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*** अँग्रेजी भाषा के बारे में भ्रम ***

Posted On: 16 May, 2012 Others में

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आज के मैकाले मानसों द्वारा अँग्रेजी के पक्ष में तर्क और उसकी सच्चाई :

1. अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है:: दुनिया में इस समय 204 देश हैं और मात्र 12 देशों में अँग्रेजी बोली, पढ़ी और समझी जाती है। संयुक्त राष्ट संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी। पूरी दुनिया में जनसंख्या के हिसाब से सिर्फ 3% लोग अँग्रेजी बोलते हैं। इस हिसाब से तो अंतर्राष्ट्रीय भाषा चाइनिज हो सकती है क्यूंकी ये दुनिया में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती है और दूसरे नंबर पर हिन्दी हो सकती है।

2. अँग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है:: किसी भी भाषा की समृद्धि इस बात से तय होती है की उसमें कितने शब्द हैं और अँग्रेजी में सिर्फ 12,000 मूल शब्द हैं बाकी अँग्रेजी के सारे शब्द चोरी के हैं या तो लैटिन के, या तो फ्रेंच के, या तो ग्रीक के, या तो दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देशों की भाषाओं के हैं। उदाहरण: अँग्रेजी में चाचा, मामा, फूफा, ताऊ सब UNCLE चाची, ताई, मामी, बुआ सब AUNTY क्यूंकी अँग्रेजी भाषा में शब्द ही नहीं है। जबकि गुजराती में अकेले 40,000 मूल शब्द हैं। मराठी में 48000+ मूल शब्द हैं जबकि हिन्दी में 70000+ मूल शब्द हैं। कैसे माना जाए अँग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है ?? अँग्रेजी सबसे लाचार/ पंगु/ रद्दी भाषा है क्योंकि इस भाषा के नियम कभी एक से नहीं होते। दुनिया में सबसे अच्छी भाषा वो मानी जाती है जिसके नियम हमेशा एक जैसे हों, जैसे: संस्कृत। अँग्रेजी में आज से 200 साल पहले This की स्पेलिंग Tis होती थी। अँग्रेजी में 250 साल पहले Nice मतलब बेवकूफ होता था और आज Nice मतलब अच्छा होता है। अँग्रेजी भाषा में Pronunciation कभी एक सा नहीं होता। Today को ऑस्ट्रेलिया में Todie बोला जाता है जबकि ब्रिटेन में Today. अमेरिका और ब्रिटेन में इसी बात का झगड़ा है क्योंकि अमेरीकन अँग्रेजी में Z का ज्यादा प्रयोग करते हैं और ब्रिटिश अँग्रेजी में S का, क्यूंकी कोई नियम ही नहीं है और इसीलिए दोनों ने अपनी अपनी अलग अलग अँग्रेजी मान ली।

3. अँग्रेजी नहीं होगी तो विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई नहीं हो सकती:: दुनिया में 2 देश इसका उदाहरण हैं की बिना अँग्रेजी के भी विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई होटी है- जापान और फ़्रांस । पूरे जापान में इंजीन्यरिंग, मेडिकल के जीतने भी कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं सबमें पढ़ाई “JAPANESE” में होती है, इसी तरह फ़्रांस में बचपन से लेकर उच्चशिक्षा तक सब फ्रेंच में पढ़ाया जाता है।
हमसे छोटे छोटे, हमारे शहरों जितने देशों में हर साल नोबल विजेता पैदा होते हैं लेकिन इतने बड़े भारत में नहीं क्यूंकी हम विदेशी भाषा में काम करते हैं और विदेशी भाषा में कोई भी मौलिक काम नहीं किया जा सकता सिर्फ रटा जा सकता है। ये अँग्रेजी का ही परिणाम है की हमारे देश में नोबल पुरस्कार विजेता पैदा नहीं होते हैं क्यूंकी नोबल पुरस्कार के लिए मौलिक काम करना पड़ता है और कोई भी मौलिक काम कभी भी विदेशी भाषा में नहीं किया जा सकता है। नोबल पुरस्कार के लिए P.hd, B.Tech, M.Tech की जरूरत नहीं होती है। उदाहरण: न्यूटन कक्षा 9 में फ़ेल हो गया था, आइंस्टीन कक्षा 10 के आगे पढे ही नही और E=hv बताने वाला मैक्स प्लांक कभी स्कूल गया ही नहीं। ऐसी ही शेक्सपियर, तुलसीदास, महर्षि वेदव्यास आदि के पास कोई डिग्री नहीं थी, इनहोने सिर्फ अपनी मात्रभाषा में काम किया।
जब हम हमारे बच्चों को अँग्रेजी माध्यम से हटकर अपनी मात्रभाषा में पढ़ाना शुरू करेंगे तो इस अंग्रेज़ियत से हमारा रिश्ता टूटेगा।

क्या आप जानते हैं जापान ने इतनी जल्दी इतनी तरक्की कैसे कर ली ? क्यूंकी जापान के लोगों में अपनी मात्रभाषा से जितना प्यार है उतना ही अपने देश से प्यार है। जापान के बच्चों में बचपन से कूट- कूट कर राष्ट्रीयता की भावना भरी जाती है।

* जो लोग अपनी मात्रभाषा से प्यार नहीं करते वो अपने देश से प्यार नहीं करते सिर्फ झूठा दिखावा करते हैं। *

दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मानना है की दुनिया में कम्प्युटर के लिए सबसे अच्छी भाषा ‘संस्कृत’ है। सबसे ज्यादा संस्कृत पर शोध इस समय जर्मनी और अमेरिका चल रही है। नासा ने ‘मिशन संस्कृत’ शुरू किया है और अमेरिका में बच्चों के पाठ्यक्रम में संस्कृत को शामिल किया गया है। सोचिए अगर अँग्रेजी अच्छी भाषा होती तो ये अँग्रेजी को क्यूँ छोड़ते और हम अंग्रेज़ियत की गुलामी में घुसे हुए है। कोई भी बड़े से बड़ा तीस मार खाँ अँग्रेजी बोलते समय सबसे पहले उसको अपनी मात्रभाषा में सोचता है और फिर उसको दिमाग में Translate करता है फिर दोगुनी मेहनत करके अँग्रेजी बोलता है। हर व्यक्ति अपने जीवन के अत्यंत निजी क्षणों में मात्रभाषा ही बोलता है। जैसे: जब कोई बहुत गुस्सा होता है तो गाली हमेशा मात्रभाषा में ही देता हैं।

॥ मात्रभाषा पर गर्व करो…..अँग्रेजी की गुलामी छोड़ो ॥

!!! जय भारत माता !!!

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pritish1 के द्वारा
August 4, 2012

हम संपूर्ण राष्ट्रवादी शक्तियों को संगठित कर देश में एक नई आजादी, नई व्यवस्था एवं नया परिवर्तन लायेंगे और भारत को विश्व की सर्वोच्च महाशक्ति बनायेंगे। यह हमारी दृढ संकल्पना है…….! जय हिंद जय भारत जय भारत स्वाभिमान……… प्रीतीश

surendra के द्वारा
May 20, 2012

आपका स्वागत है……. धन्यबाद…

yogi sarswat के द्वारा
May 17, 2012

जो लोग अपनी मात्रभाषा से प्यार नहीं करते वो अपने देश से प्यार नहीं करते सिर्फ झूठा दिखावा करते हैं। * दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मानना है की दुनिया में कम्प्युटर के लिए सबसे अच्छी भाषा ‘संस्कृत’ है। सबसे ज्यादा संस्कृत पर शोध इस समय जर्मनी और अमेरिका चल रही है। नासा ने ‘मिशन संस्कृत’ शुरू किया है और अमेरिका में बच्चों के पाठ्यक्रम में संस्कृत को शामिल किया गया है। सोचिए अगर अँग्रेजी अच्छी भाषा होती तो ये अँग्रेजी को क्यूँ छोड़ते और हम अंग्रेज़ियत की गुलामी में घुसे हुए है। कोई भी बड़े से बड़ा तीस मार खाँ अँग्रेजी बोलते समय सबसे पहले उसको अपनी मात्रभाषा में सोचता है और फिर उसको दिमाग में Translate करता है फिर दोगुनी मेहनत करके अँग्रेजी बोलता है। हर व्यक्ति अपने जीवन के अत्यंत निजी क्षणों में मात्रभाषा ही बोलता है। जैसे: जब कोई बहुत गुस्सा होता है तो गाली हमेशा मात्रभाषा में ही देता हैं। मित्रवर पहली बार आपके ब्लॉग पर हूँ और पहली बार में ही आपके लेखन का कायल हो गया ! इस मंच पर इस विषय से सम्बंधित ना जाने कितने पोस्ट आये होंगे किन्तु जो सटीक विश्लेषण आपने दिया है , सच में बहुत ज्ञानवर्धक है ! बहुत बढ़िया !

    surendra के द्वारा
    May 20, 2012

    आपका स्वागत है….संस्कृत एक पूर्ण विकसित वैज्ञानिक भाषा है….जिस प्रकार बिजली का एक बटन दबाने से अनेकों बल्ब जल जाते हैं, उसी तरह संस्कृत के एक स्वर वर्ण के उच्चारण से 18 प्रकार के आकारों का ज्ञान होता है….हम पहले देह और मन को संस्कृतमय करें, इसके पश्चात संस्कृत भाषा का प्रयोग करें तो निश्चित रूप से सफलता मिलेगी…धन्यबाद..

satish3840 के द्वारा
May 17, 2012

सुरेन्द्र ही नमस्कार / बहुत अच्छा लिखा है आपने / आपकी इस बात से में सहमत हूँ कि- बड़े से बड़ा व्यक्ति भी अँग्रेजी बोलते समय सबसे पहले उसको अपनी मात्रभाषा में सोचता है और फिर उसको दिमाग में Translate करता है फिर दोगुनी मेहनत करके अँग्रेजी बोलता है। हर व्यक्ति अपने जीवन के अत्यंत निजी क्षणों व् मुसीबत में मात्रभाषा ही बोलता है। जैसे: जब कोई बहुत गुस्सा होता है तो गाली हमेशा मात्रभाषा में ही देता हैं। हाँ कुछ लोग रोब झाड़ने के लिए इंग्लिश में गाली के सकते हें / में भी छठी कक्षा से बाहरवीं तक व अंगरेजी निबंध हिन्दी में सोचता था फिर उसको अनुवाद करके इंग्लिश में लिखता था / अब भी किसी विषय पर यदि इंग्लिश में लिखना होता हें तो हिन्दी में सोचकर ट्रांसलेट करता हूँ / अपनी मात्र भाषा में लिखने का अपना ही मजा हें / पर ये भी मानना पडेगा कि इंग्लिश आज एक ग्लोबल भाषा का रूप ले रही हें तो इसकी महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता

    surendra के द्वारा
    May 20, 2012

    धन्यबाद……किन्तु क्या ‘इंग्लिश आज एक ग्लोबल भाषा’ है..? ये विषय जरूर चर्चा करने लायक है…..अंग्रेजी विश्व के १२ देशो में बोली जाती है जिसमे भारत पाकिस्तान भी सामिल है…और ये सब देश कभी ना कभी अंग्रेजो के गुलाम रहे है….यानि अंग्रजी गुलाम देशो पर थोपी गयी भासा है….जब चीन जापान जर्मनी फ़्रांस जैसे देश अपनी मात्रभासा में पढ़कर तरक्की कर सकते है तो हम भारतीय क्यों नहीं कर सकते….??

dineshaastik के द्वारा
May 17, 2012

सुरेन्द्र जी बहुत ही उच्चस्तरीय आलेख  की प्रस्तुति के लिये बधाई…

    surendra के द्वारा
    May 20, 2012

    आपका स्वागत है…. धन्यबाद…

अजय कुमार झा के द्वारा
May 17, 2012

वाह बहुत खूब , आंखें खोलती पोस्ट ।

    surendra के द्वारा
    May 20, 2012

    आपका स्वागत है…. धन्यबाद…

sinsera के द्वारा
May 16, 2012

सुरेन्द्र जी, सटीक बातों को बहुत सार्थक तरीके से रखने के लिए आपको बधाई..अपने ही देश में जब हिंदी के साथ भेदभाव होता है तो क्या कहा जाये..राष्ट्रभाषा घोषित करते समय तमिलनाडु को इस से परे क्यों रखा गया ये बात अभी तक अनुत्तरित है..सच है जब तक अपनी उपलब्धियों पर गर्व करना नहीं सीखें गे तब तक हम धोबी के कुत्ते ही बने रहेंगे…

    surendra के द्वारा
    May 20, 2012

    आज हमें अपनी हर चीज खराब और घटिया लगती है….और हर विदेशी चीज हमें सर्वश्रेठ और आदर्श लगती है…!!..और ये कलंक भी हमें अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था के कारन लगा है…..शायद मैकाले यही चाहता था की हम भारतीय शकल से तो भारतीय हो लेकिन गुण कर्म स्वाभाव से हम अंग्रेज हो जाएँ……

    surendra के द्वारा
    May 20, 2012

    १९६६ में सर्कार ने एक खतरनाक कानून बनाया था जिसके अनुसार भारत का एक राज्य भी अगर मन कर दे तोह हिंदी लागु नही हो सकती और अंग्रेजी हट नही सकती………इस कानून को जल्दी से जल्दी बदलवाना है और जरुरत पे तो सम्विधान के अनुच्छेद ३४३ में शंशोधन करना है..हमारा लक्ष्य है के संबिधान में शंशोधन, १९६६ के कानून को बदलना, भारत के हस्पतालो से, विशाविद्यालायो से, कृषि संस्थानों से, वैज्ञानिक शंस्थानो से, राजकाज के स्तर पर, सब जगा से अंग्रेजी को हटाना…इसके लिए भारत के २२ भाषायो में जीने वाले बोलने वाले लोगो की ताकत को खड़ा करना है जो अंग्रेजी को हटाएगी…

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 16, 2012

बढ़िया लेख……… कई रोचक तथ्यों ने इसे और भी सुंदर बना दिया है……….

    surendra के द्वारा
    May 20, 2012

    आपका स्वागत है……. धन्यबाद…..

yogeshkumar के द्वारा
May 16, 2012

महाशय बेहतरीन आलेख , सच कहूं तो ब्लोग्गर ऑफ़ द वीक के लायक है….. खासकर आपने जो ये बात बोली है कि…. “हमसे छोटे छोटे, हमारे शहरों जितने देशों में हर साल नोबल विजेता पैदा होते हैं लेकिन इतने बड़े भारत में नहीं क्यूंकी हम विदेशी भाषा में काम करते हैं और विदेशी भाषा में कोई भी मौलिक काम नहीं किया जा सकता सिर्फ रटा जा सकता है। ये अँग्रेजी का ही परिणाम है की हमारे देश में नोबल पुरस्कार विजेता पैदा नहीं होते हैं क्यूंकी नोबल पुरस्कार के लिए मौलिक काम करना पड़ता है और कोई भी मौलिक काम कभी भी विदेशी भाषा में नहीं किया जा सकता है।”….. इन पक्तियों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ……. कब समझ में आएगा उन माँ बाप को जो संस्कृति और सभ्यता के बहुत बड़े सरक्षंक/ अनुयायी तो बनते हैं मगर ये बात नहीं समझ पाते…. और अपने बच्चों को बस अंग्रेजी भाषा रटाते रहते हैं. सबको अपने बच्चे अमरीका भेजने हैं बस ……. फिर बच्चे न यहाँ के ना वहां के…… इस बेवकूफों के देश में अंग्रेजी न जानना अज्ञानता कि निशानी है… अफ़सोस!!!!!!!!!……………. बेहतरीन जानकारी केलिए आभार…………….

    surendra के द्वारा
    May 20, 2012

    आपका धन्यबाद…सबसे आज सबसे जादा विदेशीपन, परायापन हमारे भाषा के स्तर पर आ गया है , हम हरे जीवन में मात्रिभाशी नही रह पाए है, स्थानीय बोली से नही जुड़ पाए है… इसका बहुत बड़ा दुसपरिणाम ये है के अंग्रेजी भाषा के कारन व्यिदार्थी यों हाल बहुत ख़राब है… सरकार के आंकड़े कहते है के प्राथमिक स्तर पर १८ करोड़ व्यिदार्थी जब पड़ने के लिए भर्ती होते है तोह अंतिम स्तर तक माने उच्चशिक्षा तक पड़ कर पास होने वाले सिर्फ एक करोड़ होते है, १७ करोड़ इस पूरी व्यवस्था में फ़ैल हो जाते है.. भारत सरकार ने शिक्ष्या व्यवस्था पर अनुसन्धान और शोध करने के लिए तिन बड़े आयोग बनाये और तीनो अयोगो का कहना था के भारत में अगर अंग्रेजी में शिक्ष्या व्यवस्था ना हो, स्थानीय भाषा में शिक्ष्या हो तोह ये १८ करोड़ सारे उच्च शिक्ष्या में पास हो सकते है….

    surendra के द्वारा
    May 20, 2012

    अगर आप के ऊपर कोई अन्याय हुआ आप अदालत में जाना चाहते है आप वोकिल करना चाहते है अंत में अपनी बात कहना चाहते है तो आप अपनी मातृभाषा में वोकिल को समझाइए फिर वोकिल उसीको भाषांतरित कर के अंग्रेजी में जज को समझाएगा फिर जज अंग्रेजी में उसी बात को वोकिल को समझाएगा फिर वोकिल उसी बात को आपके मातृभाषा में भाषांतरित करके आप को समझाएगा …. कया सत्यानाश कर रहे है हम पूरी व्यवस्था का… !!!!!!!!!!!! कितना समय ख़राब कर रहे है कितनी शक्ति बर्बाद कर रहे है…..अगर ये अंग्रेजी नही होती तो आप अपने अन्याय की कहानी नायाधिश महोदय को सीधे मातृभाषा में कह देते और नायाधिश भी आप के मातृभाषा में न्याय सुना देता किसी तीसरे आदमी की जरुरत शायद नही पड़ती….आप पैसा खर्च करे न्याय पाने के लिए और न्याय मिले विदेशी भाषा में इससे जादा शर्म और अपमान की कोई दूसरी बात नही हो सकती….

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 16, 2012

सुरेंदर जी नमस्कार , बहुत अच्छा आलेख … अंग्रेजी के कुछ तथ्य से तो अवगत थी पर जिस तरह से आपने नयी सोच और खोज के लिए मात्रीभासा(मदर लैंग्वेज ) को माध्यम बना के आगे बढ़ने की बात आपने रखी है वो काबिले तारीफ है …. प्रवाह मय … लेखन और रोचक तथ्य के लिए हार्दिक बधाई ..आपको

    surendra के द्वारा
    May 20, 2012

    धन्यबाद…


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