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भागना.. कायरता की निशानी नहीं .. अपितु अगले अवसर का प्रयास,,

Posted On: 24 Aug, 2011 Others में

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भागना.. कायरता की निशानी नहीं .. अपितु अगले अवसर का प्रयास,,

 लोग कहते हैं की बाबा रामदेव भाग गया…. … पर भाई .. जब भगाओगे तो… भागना तो पड़ेगा ही ? मर कर लड़ाई नहीं जीती जाती .. ये गंधासुर की जो कहानियां हैं न, इसने पूरी पीढ़ी का सत्यानाश मार दिया…. अहिंसा…. अनशन… भगत सिंह ने भी किया था सत्याग्रह .. लट्ठ खा कर सिद्धा हो गया था … फिर बन्दूक ही उठाई l अब आता हूँ मुद्दे पर…. 1. भगवान् श्री कृष्ण भागे थे…. मथुरा से… द्वारिका गए.. नाम पडा रणछोड़… परन्तु नाम की चिंता नहीं की उन्होंने… क्योंकि वो जानते थे की वो किस कार्य के लिए धरती पर आये हैं… और जरासंध के साथ होने वाले युद्धों में समय नष्ट होगा और जान माल की हानि अलग…. 2. … चन्द्रगुप्त मौर्य … जाने कितनी बार धननंद के राज्य में बीचों बीच घुस कर आक्रमण करता था…. फिर हार कर वापिस भाग कर आता था… क्यों…. क्योंकि अगली बार फिर कोशिश करूँगा…. 3. पृथ्वी राज चौहान भी लेके ही भागा था .. संयोगिता को … नहीं भागता .. तो जयचंद उसे वहीं खत्म कर देता… 4. शिवाजी .. फलों के टोकरे में छुप कर भागे थे… 5. दशम गुरु गोबिंद जी को भी कई मोकों पर भागना ही पडा था .. नांदेड भी गए… हजूर साहिब 6. महाराणा प्रताप की आयु तो भागते भागते.. छिपते छिपते .. जंगलों में ही गुजरी … 7. बुन्देलखण्ड का महान शूरवीर छत्रसाल…. वो भाग भाग कर ही विजयी हुआ… 8. तांत्या टोपे… नाना साहब …. ये भी भागते ही थे न… 9. … और सनातन संस्कृति की सबसे शूरवीर नारियों में अपना नाम रखने वाली .. ब्राह्मणी रानी लक्ष्मी बाई … उसको भी अंत समय में भागना ही पडा…. अपने पुत्र को पीठ पर बाँध कर भागी थी वो … 10. भगत सिंह…. भागे थे सांडर्स को मार कर… केश कटवा लिए थे…. 11. चन्द्रशेखर सीताराम तिवारी आज़ाद…. भगवा वस्त्र पहन कर ही भागे थे…. 12. सुखदेव .. राजगुरु जी … सब भागे ही थे… 13. हुतात्मा गोडसे जी खड़े रह गए…. और इस ऋषि भूमि देव तुली अखंड भारत के तत्कालीन समस्त जनमानस ने देखा….. की किस प्रकार… हरामखोर को .. हे-राम बना कर पेश किया गया… नेहरु द्वारा…. * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * भाग जाना….. कायरता नहीं होती… भाग जाना…. एक दूसरा मोका ढूँढने का अवसर भी देता है .. इसलिए आवश्यक है .. की वर्तमान पीढ़ी की मानसिकता बदली जाए…. और…. हम सब स्वयम अपनी मानसिक्त अभी बदलें .. निरर्थक CONgrASSi पुस्तकों की shikshaon को padh कर अपनी सनातन संस्कृति के गौरवशाली इतिहास को जानिये… हम लोग कभी ऐसे नपुंसक नहीं थे… इस बात पर विचार करना आवश्यक है l

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ajaysingh के द्वारा
August 25, 2011

ओह, ये क्या….     इतना अच्छा लिखते -2 ये क्या लिख डाला….. भागना सदैव कायरता नहा होती है. नीति भी होती है. सब ठीक था. लेकिन ये हरामखोर किसे कह दिया??????? ऐसा लगा जैसे तुम खुद हरामी हो. 

    ajaysingh के द्वारा
    August 28, 2011

    सुरेन्द्र बाबू,    आप नि:संदेह अच्छा लिखते है, किन्तु बाल्टी भर दूध में चुटकी भर खटाई पूरे दूध को बर्बाद कर देती है. कुछ ऐसी ही चूक (मेरी समझ से) आपने राजीव दीक्षित के किसी व्याख्यान से ’हरामखोर’ शब्द की खटाई लेकर अपने लेख में डाल कर कर दी.  भले ही यह शब्द बापू के लिये (जैसा मैने अपनी अल्प बुद्धि से अनुमान लगाया था) न हो कर जवाहर लाल नेहरु के लिए प्रयोग किया गया हो , आपत्ति जनक है. किन परिस्थितियों में उन लोगों ने क्या निर्णय लिये ,क्या गलतियाँ हो गयी  इन पर विचार करते समय उन लोगों ने किन परिस्थितियों में देश को क्या कितना कुछ दिया ये भी सोचना होगा.   अब कुछ जिम्मेदारी हम लोगो की भी है ना…..  (क्षमा करना सुरेन्द्र बाबू, उस समय इतने अच्छे लेख में ’हरामखोर’ शब्द अचानक पा कर ऐसा लगा    जैसे स्वादिष्ट खीर खाते-खाते कोई बरसाती कीड़ा दाँतों के बीच पिच्च से आ जाये और आनन्द को घृणा में बदल दे. परिणामत: मैने भी आप वाली ग़लती अपनी प्रतिक्रिया कर दी. क्षमा करना…)

Sanjay के द्वारा
August 25, 2011

मैं आपकी विचारधारा का शत प्रतिशत समर्थन करता हूँ. गाँधी जी सबको शराब, मांस जैसी बुरइयों से दूर रहने की शिक्षा देते थे. परन्तु गोमांस खाने वाले, शराबी और वेश्यावृति करने वाले नेहरू को अपना उतराधिकारी बताते थे. नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को सन्यासी के वेश में भागना पड़ा था.


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