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surendra


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*** अँग्रेजी भाषा के बारे में भ्रम ***

Posted On: 16 May, 2012  
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हिन्दुओं को चाहिए सम्पूर्ण आरक्षण….

Posted On: 20 Feb, 2012  
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राफेल विमान सौदे का ‘काला’ रहस्य…!

Posted On: 11 Feb, 2012  
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FDI इन रिटेल….शायद भारत फिर से गुलाम होने जा रहा हे….!

Posted On: 25 Nov, 2011  
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…इतना बड़ा धोखा तो अंग्रेजो ने भी नहीं किया

Posted On: 19 Nov, 2011  
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Hello world!

Posted On: 10 Aug, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: surendra surendra

अगर आप के ऊपर कोई अन्याय हुआ आप अदालत में जाना चाहते है आप वोकिल करना चाहते है अंत में अपनी बात कहना चाहते है तो आप अपनी मातृभाषा में वोकिल को समझाइए फिर वोकिल उसीको भाषांतरित कर के अंग्रेजी में जज को समझाएगा फिर जज अंग्रेजी में उसी बात को वोकिल को समझाएगा फिर वोकिल उसी बात को आपके मातृभाषा में भाषांतरित करके आप को समझाएगा .... कया सत्यानाश कर रहे है हम पूरी व्यवस्था का... !!!!!!!!!!!! कितना समय ख़राब कर रहे है कितनी शक्ति बर्बाद कर रहे है.....अगर ये अंग्रेजी नही होती तो आप अपने अन्याय की कहानी नायाधिश महोदय को सीधे मातृभाषा में कह देते और नायाधिश भी आप के मातृभाषा में न्याय सुना देता किसी तीसरे आदमी की जरुरत शायद नही पड़ती....आप पैसा खर्च करे न्याय पाने के लिए और न्याय मिले विदेशी भाषा में इससे जादा शर्म और अपमान की कोई दूसरी बात नही हो सकती....

के द्वारा: surendra surendra

आपका धन्यबाद...सबसे आज सबसे जादा विदेशीपन, परायापन हमारे भाषा के स्तर पर आ गया है , हम हरे जीवन में मात्रिभाशी नही रह पाए है, स्थानीय बोली से नही जुड़ पाए है... इसका बहुत बड़ा दुसपरिणाम ये है के अंग्रेजी भाषा के कारन व्यिदार्थी यों हाल बहुत ख़राब है... सरकार के आंकड़े कहते है के प्राथमिक स्तर पर १८ करोड़ व्यिदार्थी जब पड़ने के लिए भर्ती होते है तोह अंतिम स्तर तक माने उच्चशिक्षा तक पड़ कर पास होने वाले सिर्फ एक करोड़ होते है, १७ करोड़ इस पूरी व्यवस्था में फ़ैल हो जाते है.. भारत सरकार ने शिक्ष्या व्यवस्था पर अनुसन्धान और शोध करने के लिए तिन बड़े आयोग बनाये और तीनो अयोगो का कहना था के भारत में अगर अंग्रेजी में शिक्ष्या व्यवस्था ना हो, स्थानीय भाषा में शिक्ष्या हो तोह ये १८ करोड़ सारे उच्च शिक्ष्या में पास हो सकते है....

के द्वारा: surendra surendra

जो लोग अपनी मात्रभाषा से प्यार नहीं करते वो अपने देश से प्यार नहीं करते सिर्फ झूठा दिखावा करते हैं। * दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मानना है की दुनिया में कम्प्युटर के लिए सबसे अच्छी भाषा ‘संस्कृत’ है। सबसे ज्यादा संस्कृत पर शोध इस समय जर्मनी और अमेरिका चल रही है। नासा ने ‘मिशन संस्कृत’ शुरू किया है और अमेरिका में बच्चों के पाठ्यक्रम में संस्कृत को शामिल किया गया है। सोचिए अगर अँग्रेजी अच्छी भाषा होती तो ये अँग्रेजी को क्यूँ छोड़ते और हम अंग्रेज़ियत की गुलामी में घुसे हुए है। कोई भी बड़े से बड़ा तीस मार खाँ अँग्रेजी बोलते समय सबसे पहले उसको अपनी मात्रभाषा में सोचता है और फिर उसको दिमाग में Translate करता है फिर दोगुनी मेहनत करके अँग्रेजी बोलता है। हर व्यक्ति अपने जीवन के अत्यंत निजी क्षणों में मात्रभाषा ही बोलता है। जैसे: जब कोई बहुत गुस्सा होता है तो गाली हमेशा मात्रभाषा में ही देता हैं। मित्रवर पहली बार आपके ब्लॉग पर हूँ और पहली बार में ही आपके लेखन का कायल हो गया ! इस मंच पर इस विषय से सम्बंधित ना जाने कितने पोस्ट आये होंगे किन्तु जो सटीक विश्लेषण आपने दिया है , सच में बहुत ज्ञानवर्धक है ! बहुत बढ़िया !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

सुरेन्द्र ही नमस्कार / बहुत अच्छा लिखा है आपने / आपकी इस बात से में सहमत हूँ कि- बड़े से बड़ा व्यक्ति भी अँग्रेजी बोलते समय सबसे पहले उसको अपनी मात्रभाषा में सोचता है और फिर उसको दिमाग में Translate करता है फिर दोगुनी मेहनत करके अँग्रेजी बोलता है। हर व्यक्ति अपने जीवन के अत्यंत निजी क्षणों व् मुसीबत में मात्रभाषा ही बोलता है। जैसे: जब कोई बहुत गुस्सा होता है तो गाली हमेशा मात्रभाषा में ही देता हैं। हाँ कुछ लोग रोब झाड़ने के लिए इंग्लिश में गाली के सकते हें / में भी छठी कक्षा से बाहरवीं तक व अंगरेजी निबंध हिन्दी में सोचता था फिर उसको अनुवाद करके इंग्लिश में लिखता था / अब भी किसी विषय पर यदि इंग्लिश में लिखना होता हें तो हिन्दी में सोचकर ट्रांसलेट करता हूँ / अपनी मात्र भाषा में लिखने का अपना ही मजा हें / पर ये भी मानना पडेगा कि इंग्लिश आज एक ग्लोबल भाषा का रूप ले रही हें तो इसकी महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता

के द्वारा: satish3840 satish3840

महाशय बेहतरीन आलेख , सच कहूं तो ब्लोग्गर ऑफ़ द वीक के लायक है..... खासकर आपने जो ये बात बोली है कि.... "हमसे छोटे छोटे, हमारे शहरों जितने देशों में हर साल नोबल विजेता पैदा होते हैं लेकिन इतने बड़े भारत में नहीं क्यूंकी हम विदेशी भाषा में काम करते हैं और विदेशी भाषा में कोई भी मौलिक काम नहीं किया जा सकता सिर्फ रटा जा सकता है। ये अँग्रेजी का ही परिणाम है की हमारे देश में नोबल पुरस्कार विजेता पैदा नहीं होते हैं क्यूंकी नोबल पुरस्कार के लिए मौलिक काम करना पड़ता है और कोई भी मौलिक काम कभी भी विदेशी भाषा में नहीं किया जा सकता है।"..... इन पक्तियों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ....... कब समझ में आएगा उन माँ बाप को जो संस्कृति और सभ्यता के बहुत बड़े सरक्षंक/ अनुयायी तो बनते हैं मगर ये बात नहीं समझ पाते.... और अपने बच्चों को बस अंग्रेजी भाषा रटाते रहते हैं. सबको अपने बच्चे अमरीका भेजने हैं बस ....... फिर बच्चे न यहाँ के ना वहां के...... इस बेवकूफों के देश में अंग्रेजी न जानना अज्ञानता कि निशानी है... अफ़सोस!!!!!!!!!................ बेहतरीन जानकारी केलिए आभार................

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

के द्वारा: surendra surendra

कांग्रेस आखिर चाहती क्या है? वाल मार्ट और उसके जैसी लुटेरी कंपनियों के भारत में किराना स्टोर खोलने पर क्या होगा........ श्री अडवानी जी कहाँ हैं....क्या सोनिया जी के तलवे चाट रहे हैं?.. उन्होंने तो सोनिया का character certificate भी पहले ही दे रखा है. क्या उनकी भी मौन सहमति है वाल मार्ट को खोलने के लिए? कुछ जानकारियों: १-अकेले वाल मार्ट की परिसम्पत्तियो की कीमत ४० गरीब देशो की कुल आय से भी ज्यादा है. २-एक बार ये कंपनी भारत आ गयी तो इसके जाने से पहले भारत के कईं करोड़ लोगो को मरना होगा क्योकि एक छोटी सी ईस्ट इंडिया कंपनी को भगाने के लिए ६५०००० लोगो ने अपनी जान दी थी. ३-भारत सरकार को निश्चित ही विदेशी लोग चला रहे है इसी लिए इन्होने विदेशियों को भारत में किराना स्टोर खोलने की अनुमति दे दी है,क्या भारत के लोगों को किराना दुकान चलाना नहीं आता? ४-भारत में १२०००००० लोग ठेले पर, फूटपाथ पर, सर पर सब्जी, कपडा, बर्तन, आदि सभी सामानों को बेचकर जीविका चलाते है अब इसमे से कम से कम ७०% या कहिए की करीब ८५००००० लोग ४ साल के अन्दर दुकान बंद करे के लिए बाध्य हो जायेंगे और समाज में मार काट चोरी- भुखमरी मचेगी. भारत में वैसे ही २० करोड़ लोग खाटी बेरोजगार है यानि भारत में बेरोजगारों की संख्या में बेतहासा वृद्धि होगी. ५-ये विदेशी कंपनिया यहाँ मुनाफा कमाने के लिए आ रही हैं, यानि मुनाफा विदेश जायेगा और विदेशी माल बेचने से भारत में और बेरोजगारी आयेगी और सभी स्वदेशी कारखाने जल्दी ही बंद हो जायेगे. ६-अब स्वदेशी से स्वावलंबन का सपना शायद ही पूरा हो पाए यानि नेहरू का दस्तखत किया हुआ "ट्रांसफर ऑफ़ पॉवर अग्रीमेंट " पूरी तरह से अब लागु हो रहा है जो अंग्रेजो के द्वारा पास किये गए "इंडियन इनडीपेंडेंस एक्ट-१९४७" के हिसाब से चल रहा है. अब भारत में विषमुक्त खेती की बात करना और आयुर्वेद को बढ़ावा सब बेमानी हो जायेगा. ७-बहुत सारे कानून बनाने थे, विदेशी किराना दुकान का कानून लाना क्यों जरुरी था? ये ऐसे ही जैसे की कांग्रेस काला धन लाना चाहती है. यदि निवेश चाहिए तो काला धन लाइए, रामदेव बाबा का समर्थन कीजिये, भारत में १०० लाख करोड़ का काला धन पहले से है. और २५० लाख करोड़ बाहर जमा है.. कांग्रेस इस देश को अब कब तक विदेशियो से लूट्वाएगी?? ए तो वैसे है जैसे चिदंबरम ने सोनिया के कहने से ८ इटालियन और ४ चोर स्विस बैंक चोरी चोरी खुलवाये थे. अब आगे क्या होगा..... इस देश को अंग्रेजो ने काले अंग्रेजो के साथ मिलकर बर्बाद किया था और आगे भी करेंगे.... जय भारत,

के द्वारा: surendra surendra

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

श्रीमानजी शर्मिन्दा ना करें क्योंकि हमारे हाथ में पांच वर्षों में एक बार वोट देने के सिवा कुछ नहीं है.हां हमारे कदम कभी रामदेव जी या फिर कभी अन्ना जी के पीछे चल पड़ते हैं किन्तु जैसे ही वे लोग बैठते हैं हमारे कदम भी घर को लौट आते हैं और जबान कैंची की तरह चलने लगती है. सब जानते है किसका पैसा विदेशों में जमा है और अब क्या जमा और क्या ना जमा, सब रफा दफा हो चुका है क़ानून की बात कुछ दिन पहले आदरणीय ओ पी परिक जी ने उठायी थी मगर उनके उस आलेख पर यदि प्रतिक्रियाएं भी देखि जाएँ तो शायद मेरे एक हाथ की उँगलियों से भी कम ही होंगी. अब इस देश में इसे आप धोका कहो या कुछ भी कहो ऐसा ही चलता रहेगा. फिर भी आपने लिखा आभार आपका.

के द्वारा: akraktale akraktale

सुरेन्द्र बाबू,    आप नि:संदेह अच्छा लिखते है, किन्तु बाल्टी भर दूध में चुटकी भर खटाई पूरे दूध को बर्बाद कर देती है. कुछ ऐसी ही चूक (मेरी समझ से) आपने राजीव दीक्षित के किसी व्याख्यान से 'हरामखोर' शब्द की खटाई लेकर अपने लेख में डाल कर कर दी.  भले ही यह शब्द बापू के लिये (जैसा मैने अपनी अल्प बुद्धि से अनुमान लगाया था) न हो कर जवाहर लाल नेहरु के लिए प्रयोग किया गया हो , आपत्ति जनक है. किन परिस्थितियों में उन लोगों ने क्या निर्णय लिये ,क्या गलतियाँ हो गयी  इन पर विचार करते समय उन लोगों ने किन परिस्थितियों में देश को क्या कितना कुछ दिया ये भी सोचना होगा.   अब कुछ जिम्मेदारी हम लोगो की भी है ना.....  (क्षमा करना सुरेन्द्र बाबू, उस समय इतने अच्छे लेख में 'हरामखोर' शब्द अचानक पा कर ऐसा लगा    जैसे स्वादिष्ट खीर खाते-खाते कोई बरसाती कीड़ा दाँतों के बीच पिच्च से आ जाये और आनन्द को घृणा में बदल दे. परिणामत: मैने भी आप वाली ग़लती अपनी प्रतिक्रिया कर दी. क्षमा करना...)

के द्वारा: ajaysingh ajaysingh




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